फिर कविता को नया जन्म देने – पं. विश्वेश्वर शर्मा

फिर कविता को नया जन्म देने की खातिर, मैंने अपने गर्भ साधना पूरी कर ली | अब तो देह प्रसव पीड़ा से टूट रही है | जाने किस क्षण नए सूर्य की लाली फूटे? जाने किस क्षण नए चहक उठे नीड़ो के पंची? और अंधियारे को किरणों का माली लुटे || फिर सविता से नयी … Continue reading फिर कविता को नया जन्म देने – पं. विश्वेश्वर शर्मा

जीवन के इस घेरे में – पं. विश्वेश्वर शर्मा

जीवन के इस घेरे में, धुप छाओं के डेरे में पलभर भी मुस्कान मिले तो ना छोडू | दो आँखों  के पहरे में मन के घने अँधेरे में, झूठा भी अरमान मिले तो ना छोडू | सुबह को पकड़ते ही शाम चली आती है, ज़िन्दगी की रेत तो फिसलती ही जाती है, अपनी ही सासे … Continue reading जीवन के इस घेरे में – पं. विश्वेश्वर शर्मा