15 सितम्बर सन 1933  ! श्री कृष्ण निकुंज, भट्टियानी चोहट्टा, उदयपुर (राज.) में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में पंडित विश्वेश्वर शर्मा का जन्म हुआ |

बचपन से ही कला और साहित्य की तरफ आकर्षण माता की वजह से रहा | कविता और गीत का लेखन पंडित जी बाल्यावस्था से ही करने लग गए थे , और चाहते थे की मुंबई आ कर फिल्मो में अभिनय करे |

पंडित जी ने लगातार चालीस वर्षो तक मंच पर कविता पाठ किया और कई उतार - चड़ाव भी देखे | एक समय ऐसा भी आया जब श्रोताओ का रुझान कविता और गीतों की तरफ से कम हो गया और हास्य प्रस्तुतियों की तरफ अधिक ऐसे समय में फिर मनहर जी की राय और सहायता पंडित जी के काम आई , हुआ यू की मनहर जी ने पंडित जी का लिखा प्रतिगीत सुना और कहा की उन्हें मंचो पर यही करना चाहिए पंडित जी ने मंचो पर प्रतिगीत यानी पैरोडी सुनाना शुरू किया और देखते ही देखते वो पैरोडी सम्राट के तोर पर प्रतिष्ठित हो गए |

अपने लम्बे साहित्यिक जीवन में पंडित जी ने बिम्ब - बिम्ब चांदनी , आश्विन की धूपबिम्ब, मैं सच कहता हु, गीत यात्रा, सामानांतर रेखाए, दावडी, कालिदास जैसे कालजयी उपन्यास, खंडकाव्य, गीत संग्रह, कविता और ग़ज़ल संग्रह का लेखन किया | पंडित जी ने हिंदी के अलावा राजस्थानी और गुजरती भाषा में भी अधिकार पूर्ण लेखन किया | लगभग 80 से ज्यादा फिल्मो में गीत लिखे जिसमे हिंदी के अलावा राजस्थानी और गुजरती फिल्मे भी शामिल है |

ऐसे महान लेखक, साहित्यकार का निधन 29 दिसम्बर 2014 को अपने पैत्रिक निवास उदयपुर में लम्बी बीमारी के बाद हुआ | लेखन में योगदान के लिए फिल्म जगत एवं श्रोताओ के ह्रदय में हमेशा जीवित रहेंगे|

उनके बाद परिवार में उनके पौत्र नीलाभ शर्मा एवं ययाती पंड्या उन्ही के मार्ग पर चलते हुए थिएटर और फिल्म - टेलीविज़न में अपना सक्रिय योगदान दे रहे है|